श्रीमती इंदिरा गाँधी के हत्या का सच !

कांग्रेस के राजकुमार राहुल गाँधी हमेशा अपने दादी का देश के लिए दिए बलिदान को याद करते है | यह सच है की स्व. इंदिरा गाँधीजी की हत्या हुवी | यह भी सच है की पंजाब में पनपे देश विरोधी ताकद को परास्त करने के लिए सिख समुदाय के श्रद्धास्थान सुवर्ण मंदिर में किये गए फौजी करवाई के विरोध में, एवम तथाकथित सिख संत भिंडरावाले के मृत्यु का बदला लेने के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी को मारा गया | पर यह सरासर "अर्धसत्य" है ! सच तो यह है की पंजाब में अपनी राजनीती चमकाने, अपनी राजकीय महत्वाक्षां के चलते स्व श्रीमती इंदिरा गाँधी एवम उनके सुपुत्र स्व संजय गाँधी ने भिंडरावाले का भुत पंजाब में खड़ा किया जिसका खामियाजा न की सिर्फ पंजाब को अपितु सारे देश को भुगतना पड़ा |   

१९७७ के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुवी, अकाली दल पंजाब में सक्षम राजनैतिक पक्ष में उभरा, प्रकाशसिंह बादल बतौर पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में विराजमान हुवे | इतना ही नहीं तो इस के बाद पंजाब में संपन्न हुवे हर चुनाव में अकाली दल ने कांग्रेस को हार का चेहरा बारबार दिखाया | अकाली दल के इस विजयी अश्व को लगाम लगाने हेतु कांग्रेस को कोई बड़ा चेहरा पंजाब में चाहिए था | वैसे पंजाब में ग्यानीजैलसिंग, दरबरसिंग ऐवम सवर्णसिंग पंजाब कांग्रेस के बड़े चेहरे थे, लेकिन उनकी आपस में ही वर्चस्व की अपनी लड़ाई चल रही थी, जिसका खामियाजा पंजाब कांग्रेस भुगत रही थी !
पंजाब की इस राजनैतिक उथलपुथल को समज़ने के लिए हमे सीखो के श्रद्धा मान्यताओं को समज़ना भी बेहद जरूरी है | सिख पंथ में निरंकारी ऐवम अकाली ये दो भाग है | सीखो के अंतिम गुरु "गुरु गोविन्द सिंग" इन्होने आदेश दिया की इसके बाद कोई जीवित गुरु नहीं तो हमारा धर्मग्रंथ "गुरु ग्रंथ साहेब" ही हमारा "गुरु" रहेंगे | पर "निरंकारी" अभी भी जीवित गुरु को ही गादी का उत्तराधिकारी मानते है, जो "अकाली" को मंजूर नहीं, यही निरंकारी एवम अकालियों के तेढ का कारण है | 
तो पंजाब में हो रही कांग्रेस की दुर्दशा को रोकने हेतु, ऐवम अकाली दल का बढ़ते राजनैतिक वर्चस्व को मात देने हेतु जब कांग्रेस पंजाब में कोई बड़ा चेहरा तलाश रही थी, तो ग्यानीजैलसिंगजी ने प्रमुख संत भिंडरावाले की "खोज" की ! ग्यानीजैलसिंगजी ने भिंडरावाले को संजय गाँधी से मिलवाया, भिंडरावाले के तेवर से संजय गाँधी अच्छे खासे प्रभावित हुवे।    

१३ एप्रिल १९७८ को निरंकारी तथा अकालियों के बिच रक्तरजित संघर्ष हुवा | इस संघर्ष में १३ अकाली सिख मारे गए | इस प्रकरण में निरंकारी बाबा गुरुबचनसिंग को पकड़ा गया ऐवम उनपे हरियाणा राज्य में मुकदमा दायर किया गया  | पर इस मामले से बाबा गुरुबचनसिंग आश्चर्यकारक रूप में सहीसलामत बच गए | इस पुरे प्रकरण से सिख समाज में आक्रोश निर्माण हुवा, अकाली दल पंजाब में आंदोलन करने को प्रेरित हुवा | इसी धार्मिक उथलपुथल के बिच इस आंदोलन में भिंडरावाले का उदय हुवा, नतीजा यह आंदोलन अकाली दल के हात से फिसल के भिंडरावाले के हात में चला गया | इसी बिच २४ एप्रिल १९८० में निरंकारी बाबा गुरुबचनसिंग की हत्या हो गयी, नतीजा यह हुवा की पंजाब की धार्मिक आंदोलन की पूरी बागडोर भिंडरावाले के हातोंमे चली गयी | निरंकारी बाबा गुरुबचनसिंग के हत्या में संमलित लोग भिंडरावाले को साथ देने वाले थे ये बात किसी से छुपी हुवी नहीं थी | 
इसी पंजाब के राजनैतिक ऐवम धार्मिक उथलपुथल वाले दौर में प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैय्यर भिंडरावाले से सात्क्षात्कार के लिए गए तब की यादे उन्होंने अपने “बियोंड दी लाइफ” किताब लिखी है | जब कुलदीप नैय्यर ने बातचीत के दौरान भिंडरावाले को पुलिस के पास उपलब्ध आधुनिक शस्त्र ऐवम पुलिस के  राजनैतिक, संवैधानिक अधिकारों से अवगत करने की कोशिश की, तो भिंडरावालेने बड़ी गर्मी से जवाब गया," उन्हें (पुलिस को) मुज़से लड़ने के लिए बोलिये!" उसी वक्त कांग्रेस के बड़े नेता स्वर्णसिंग जो संरक्षण मंत्री ऐवम विदेश मंत्री भी रह चुके थे, भिंडरावाले से मिलने पहुंचे। वह भिंडरावाले के सामने जमीनपर ही बैठ गए, यह देख हड़बड़ाए कुलदीपजी ने अपनी कुर्सी स्वर्णसिंग को देने की चेष्टा की, पर स्वर्णसिंग ये कहते कुर्सी ठुकरा दी की,"एक संत के सामने कुर्सी पर कैसे बैठे?" और वह जमीन पर ही बैठे रहे।  यही था भिंडरावाले के लिए कांग्रेस का दृष्टिकोण !

१९८० में पंजाब के चुनाव में कांग्रेस भारी मतो से जीत कर सत्ता में वापस आयी।  इस चुनाव से पहिले संजय गाँधी और ग्यानीजैलसिंग ने भिंडरावाले को  एक नए राजनैतिक पक्ष का गठन के लिए मदत की।  इसके एवज में भिंडरावाले ने पंजाब चुनाव में अनेक जगह कोंग्रेस की मदत की, इसी में महत्व की जगह थी अमृतसर ! इसी बिच बीबीसी को दिए एक सात्क्षात्कार में इंदिरा गाँधी ने, "हम भिंडरावाले के सिर्फ नाम से वाफिक है !" कहते, हुवे भिंडरावाले और कांग्रेस के संबंध की बात को सिरे से ख़ारिज किया। पर इस चुनाव के बाद ग्यानीजैलसिंग को केंद्रीय गृहमंत्री की पदोन्नति दिए गयी, दरबारसिंग पंजाब के मुख्यमंत्री बन गए | इस त्रिकोन में का तीसरा कोन भिंडरावाले था और वह लगातार अपनी ताकद बढ़ा रहा था | इस सब राजनैतिक उथलपुथल का नतीजे के कारण अकाली दल फिर से अपनी पुरानी राजकीय भूमिका में जाने के लिए मजबूर हुवा, नतीजा पंजाब की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थिति ज्यादा स्फोटक बन गयी।  
९ सप्टेंबर १९८१ में पटियाला - जालंधर हाइवे पे दो बुलेट पर सवार चार आतंकवादियोने पंजाब के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और महत्व के हिंदी अख़बार के मुख्य संपादक लाला जगत नारायण इनकी हत्या कर दी | इस हत्या की ऊँगली सीधे तौर पर भिंडरावाले के तरफ उठी! इसके कुछ तत्कालीन कारण थे, क तो लाला जगत नारायण भिंडरावाले के प्रखर विरोधी थे, अपने अख़बार में भिंडरावाले के विरोध में हमेशा लिखते थे | दूसरा कारण ये था उसी समय पंजाब में होने वाली जनगणना में हिन्दुओ को अपनी मातृभाषा के रूप में पंजाबी के बजाए हिंदी लिखने का आवाहन लाला जगत नारायण कर रहे थे, भिंडरावाले इस आवाहन के प्रखर विरोध में उतर आये थे | 
लाला जगत नारायण के हत्या के चार दिन बाद भिंडरावाले विरोध में वारंट निकला गया | वारंट निकला तब भिंडरावाले हरियाणा राज्य में था। पर वहा भिंडरावाले को पकड़ने के बजाये सरकारी गाड़ी में बिठाकर भगाया गया | आखिर में १५ सप्टेंबर १९८१ में विरोधी वातावरण देखते हुवे भिंडरावाले को पकड़कर कारागार में डाला गया | पर तब तक भिंडरावाले की धार्मिक ऐवम राजनैतिक हैसियत बढ़ गयी थी। इस प्रकरण में "संतो के साथ दुर्व्यवहार" का धार्मिक राजनैतिक कार्ड खेला गया, साथ ही सीखो के लिए "खलिस्तान" की पुकार भी तभी सामने आई।  आख़िरकार इस प्रकरण में राजनैतिक हस्तक्षेप कर भिंडरावाले की रिहाई की गयी।  तत्कालीन गृहराज्य मंत्री बुटसिंग को सामने आकर भिंडरावाले के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत न मिलने का राग आलापना पड़ा।  पर इंदिरा गाँधी की प्रसिद्ध चरित्रकार पुपुल जयकर की हिसाब से भिंडरावाले की रिहाई में इंदिरा गाँधी का सीधा हस्तक्षेप था।  

इस प्रकरण के तुरंत बाद भिंडरावाले अपने पुरे लश्कर और तामझाम के साथ देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे।  अपने हत्यारबंद आदमियों के साथ ट्रक के उप्पर बैठकर सारे दिल्ली में दर्शन कार्यक्रम करते घूमता रहा।  बताया जाता है की भिंडरावाले का यह दिल्ली दौरा किसी कांग्रेस के बड़े नेता ने प्रायोजित किया था, लेकिन उस नेता का नाम आज तक उजागर नहीं हुवा। इस दिल्ली प्रवास में भिंडरावाले सिख कोंग्रेसी नेता संतोखसिंग के घर एक शोक सभा में समलित हुवे, तब वहा राजीव गाँधी भी उपस्थित थे।  
इस अटक और रिहाई के नाटक का उपयोग भिंडरावाले अपनी साख को बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया, तथा इस सब का श्रेय बड़े अभिमान से श्रीमती इंदिरा गाँधी को देने लगा था। पर इस सब प्रकरण में कांग्रेस आखे मुद क्र बैठी रही ऐवम अपने राजनैतिक फायदे को देखती रही।  इधर भिंडरावाले को अलग खलिस्तान के मुद्दे पर व्यापक समर्थन मिलना शुरू हुवा।  खास कर NIR शिख समाज की ओर से। बांग्लादेश यद्ध का अपमान का बदला भारत के टुकड़े करके  लेने का मन बनके देश का शत्रु पाकिस्तान ने इस मौके का फायदा लेने की ठानी और बड़े लगन से भिंडरावाले को पैसा और शस्त्रों की मदत करने लगा।  इससे पंजाब और पंजाब में के हिन्दुओ को एक नए हिंसाचारी दौर का सामना करना पड़ा | भारतीयों को "आतंकवाद" का परिचय हुवा।

अब शक्तिशाली बना भिंडरावाले और आक्रमक रुख अपनाने लगा। २९ अप्रैल १९८१ को श्रीनगर से दिल्ली आ रहे विमान का अपहरण करके लाहौर उतारा गया और जहाल आतंकी जरनैलसिंग भिंडरावाले को रिहा करने की मांग रखी गयी।  ओक्टोबर १९८१ में जरनैलसिंग भिंडरावाले को रिहा किया गया।  १९८२ में भी दिल्ली से श्रीनगर जाने वाले विमान का अपहरण करके लाहौर ले जाया गया, लेकिन वहां विमान को उतारने की संमति न मिलने पर अमृतसर को उतारा गया, जहा भारतीय सेना ने कमांडो करवाई कर विमान को अपहरणकर्ता के चंगुल से छुड़ाया। 
२३ अप्रैल १९८३ ला पंजाब पोलिस के डी आय जी अवतारसिंग अटवाल सुवर्ण मंदिर में दर्शन हेतु जाने के बाद सुवर्ण मंदिर के ठीक सामने गोली मार कर हत्या  कर दी गयी। उस वक्त उपरोक्त स्थान पर करीब १०० पोलिस के कर्मचारी उपस्थित थे, पर फिर भी डी आय जी अवतारसिंग अटवालजी का शव वहा २ घंटे पड़ा रहा। फेब्रुवरी १९८४ को प्रीतलारी मासिक के संपादक सुमितसिंग शम्मी की हत्या कर दी गयी, इसके बाद अप्रैल १९८४ को भाजप के नेता ह्र्बंसलाल खन्ना की हत्या कर दी गयी। में १९८४ में स्व. लाला जगत नारायण के सुपुत्र और दैनिक पंजाब केसरी के प्रमुख रमेशचंद्रजी की हत्या जालंधर में की गयी।  यह सब तत्कालीन पंजाब में आतंकवादियों ने अंजाम दिये कुछ प्रमुख घटनाये है।  इन घटनाओ के व्यतिरिक्त भी भारतप्रेमी सिख और सामान्य हिन्दू परिवारों को अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया गया, अनेक संकटो का सामना करना पड़ा । पर कांग्रेस अपने राजनैतिक वर्चस्व के आकांक्षा के चलते इस घटनाओ पर आखे मुंद कर बैठी रही।  दिसंबर १९८३ में जरनैलसिंग भिंडरावाले ने सुवर्ण मंदिर परिसर में स्थित अकाल तख्त में आश्रय लिया।  ३० में १९८४ तक सुवर्ण मंदिर और उसके आजुबाजु का परिसर पूरी तरह खलिस्तानवादी आतंकवादियों के नियंत्रण में चला गया।  इस  परिस्थिति को  जल्द से जल्द नियंत्रण में नहीं लाया गया तो "पृथक खलिस्तान" के घोषणा के साथ पंजाब राज्य भारत हातो से जाने का डर सताने लगा।  

सच तो यह है की तत्कालीन परिस्थिति में पंजाब की जनता, पंजाब राज्य के अलग अलग राजनैतिक गट, पंजाब कांग्रेस के बहुसंख्य नेतागण भिंडरावाले से निजाद पाना चाहते थे। इसीलिए भिंडरावाले पर करवाई करने की चाहत अगर राज्य या केंद्र सरकार रखती तो कोई भी इसके विरोध में नहीं जाता। मगर जब भिंडरावाले पण करवाई करने का सही समय था तब राज्य सरकार के हाथ श्रीमती इंदिरा गाँधी ने बांध रखे थे। जब भिंडरावाले सुवर्ण मंदिर में आश्रय लेने जा रहा था तभी उसको रोकना, कैद करना आवश्यक था, जो की हो नहीं सका।  लेकिन जब भिंडरावाले सुवर्ण मंदिर में अपनी पैठ बना चूका तब करवाई करने से पाहिले पंजाब की जनता, विविध पक्ष के नेतागण से बातचीत करना, सलाह करना जरूरी था।  पर श्रीमती इंदिरा गाँधी ने ये कवायद करना उचित नहीं समझा, इतना भारत के तत्कालीन सिख समाज के राष्ट्रपति ग्यानीजैलसिंगजी को भी इस विषय में भरोसे में नहीं लिया गया और आननफानन में सुवर्ण मंदिर में करवाई के लिए सेना को भेजाने का निर्णय लिया गया जिससे एक और जटिल धार्मिक विवाद ने जन्म लिया।  
आखिरकार भिंडरावाले नाम का आधुनिक भस्मासुर उल्टा अपने ऊपर आ गया है ये संज्ञान में आने से कांग्रेस की आखे खुली, साथ में देश के जनता में भी गलत सन्देश जाते देख, इसी दबाव में  इंदिरा गाँधी ने ३ जून १९८४ को सुवर्ण मंदिर में सेना को करवाई के आदेश दिए, यही "ऑपरेशन ब्लू स्टार" था।  जो ३ जून से ६ जून १९८४ तक चला, भिंडरावाले मारा गया, लेकिन भारत के सिख समाज की धार्मिक श्रद्धा आहत हुवी।  जिसका असर भारतीय सेना में सिख सैनिको के विद्रोह के रूप में उभरा, भारतीय सेना ने वक्त रहते इस विद्रोह पर तो काबू पा लिया।  पर अगले कुछ साल पंजाब इस आग में जलता रहा और देश हताशा से देखता रहा, इस जलते पंजाब के कुछ आग के गोले देश के दूसरे हिस्से में भी आग लगते रहे।  
कुल मिलाके पंजाब कांग्रेस और श्रीमती इंदिरा गाँधी के राजनैतिक महत्वकांशा की जबरदस्त कीमत पंजाब और देश के आम नागरिकों को चुकानी पड़ी।  पाकिस्तान सरीके भारत के शत्रु को देश में राजनैतिक अजरकता फ़ैलाने की नयी दृष्टी मिली, जिसका उपयोग पाकिस्तान ने कश्मीर प्रश्न में नए सिरे से गर्माहट लाने के लिए किया।  यह सब "महाभारत" का परिणाम ३१ ओक्टोबर १९८४ को श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या उन्हीके अंगरक्षको द्वारा अंजाम दिए जाने में हुवा।  यह ब्रिटिश सरकारके "फोड़ो और राज करो" तत्व पर आधारित राजनैतिक व्यवहार करने वाले राजनीतिका दुखद अंत था।  पर इतिहास के इस दुखद पर्व से कांग्रेस ने आज कोई शिक्षा हासिल नहीं की ऐसा आज के कांग्रेस के मनोदशा से लगता है।            
  



टिप्पणियाँ