वह जब याद आये .... बड़े याद आये

देश की राजनीती चायनीज कोरोना विषाणु के प्रकोप, राम मंदिर भूमिपूजन, राफेल, लॉकडाउन -अनलॉक के दावे प्रतिदावों में उलझन में फसी है।  इसी राजनीती के बिच भारतीय कांग्रेस पक्षने भी अपनी राजनीती तेलंगना राज्य के जरिये देश भर में चमकाने के लिए डाव खेला। यह डाव था १६ साल बाद कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री  स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी को याद करना, कांग्रेस ने सिर्फ उनकी याद ही नहीं निकली तो उन्होंने देश के आर्थिक विकास में दिए योगदान के लिए तारीफों के पुल भी बांधे। आश्चर्य तब हुवा जब यह तारीफ कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गाँधी की तरफ से की गयी।  पी चितंबरम, कपिल सिब्बल, राहुल गाँधी जैसे कांग्रेस नेताओ ने भी  स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के तारीफों की झडी लगादी।  
कभी कोंग्रेसने इसी पूर्व प्रधानमंत्री के शव को ना कांग्रेस के दिल्ली स्थित मुख्यालय में जगह दी थी, ना दिल्ली के राजघाट में अंतिम संस्कार करने की इजाजत, कांग्रेस मुख्यालय के गेट के सामने खड़े रख वही से  स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी का शव अंतिम संस्कार के लिए सीधे हैदराबाद के लिए रवाना किया गया था।  कांग्रेस गाँधी परिवार को छोड़ बाकि अपने ही नेताओ की उपेक्षा बहुत करती है, लेकिन स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के साथ मरणोपरान्त जो किया यह व्यवहार में उपेक्षा से ज्यादा व्देषमूलक था।  इसीलिए जब कांग्रेस के बड़े नेता एकाएक स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी को याद करते हुवे, श्रध्दांजली देते हुवे तारीफों के पुल बांधने लगे तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है। कोंग्रेस का प्रेम देखते हुवे, स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के पोते और भाजपा के नेता एन व्ही सुभाष इन्होने, "कांग्रेस को स्व. पि व्ही नरसिंहराव को याद करने में १६ साल क्यों लगा दिए ?" पूछते हुवे तंज कसा ! 
स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी यह एक निष्ठावान कोंग्रेसी थे। उन्होंने अपना पूरा राजकीय जीवन कांग्रेस में ही बिताया, पक्ष अंतर्गत राजनीती में की बार हाशिये पर जाने के बाद भी वह कांग्रेस के साथ, कांग्रेस की विचारधारा के साथ से जुड़े रहे। राजीव गाँधी के हत्या के बाद और सोनिया गाँधी ने तत्कालीन परिस्थिती में मुँह फेरने के कारण कोंग्रेसमे वर्चस्व की होड़ उत्पन्न हुवी, जिसमे नरसिंहरावजी का पड़ला भारी रहा और वह प्रधानमंत्री की खुर्सी पर विराजमान हो गए। नरसिंहरावजी ने जब कमान संभाली तो कांग्रेस सदन में अल्पमत में थी।  राजीव गाँधी हत्या और अंतर्गत संघर्ष के कारण उलझन में थी।  तो देश अपने आर्थिक हालत पे रो रहा था, देश की आर्थिक हालत खस्ता थी।  अपने पास का सोना देश के बाहर गिरवी रखने की हालत देश पे आयी थी।  पंजाब, कश्मीर और आसाम में आतंकवाद बढ़ रहा था।  राम मंदिर का मुद्दा गहरा रहा था।  
इस परिस्थिति में नरसिंहरावजी ने गैर राजनैतिक व्यक्ति और प्रसिध्द अर्थशात्री मनमोहनसींग को अर्थमंत्री पद पे ले आये।  उनके पीछे अपनी पूरी ताकद देते हुवे देश के अर्थव्यवस्था को वैश्वीकरण के दायरे में ले आये।  खुली अर्थव्यवस्था के लाभ मिलने से देश की अर्थ व्यवस्था फिर पटरी पर आगयी। कश्मीर, पंजाब और आश्रम में चुनाव करवा के वहां शांति बहाल करने की कोशिश की, कुछ हद तक सफल भी रहे। 
लेकिन समस्या आयी "राम मंदिर" विवाद निपटने में। "राम मंदिर" आंदोलन अपने चरम पर पंहुचा, नतीजा यह हुवा की अयोध्या में "राम मंदिर" के जगह खड़ा "विवादिक ढांचा" गिराया गया और देश सांप्रदायिक दंगो में जलाने लगा।  स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी से कांग्रेस ने मुँह मोड़ा उसका बड़ा कारण शायद इसमें छुपा है। "विवादिक ढांचा" स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के कांग्रेस प्रणीत सरकार केंद्र में रहते गिरने से मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस के हात से फिसली, कांग्रेस की तरफ से मुस्लिमोंका मोहभंग हो गया। यही निष्कर्ष शायद कांग्रेस को स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी की तरफ से मुँह फेर लेने का कारण बना।  फिर आज कांग्रेस को स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी की याद क्यों आने लगी ?
स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी का जन्म २१ जून १९२१ में आज के तेलंगाना राज्य के, वारंगल जिले के लकनेपल्ली गांव में हुवा। २०२० - २०२१ स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी का जन्मशताब्दी वर्ष है। कांग्रेस ने मुँह फेरने के कारण अब स्व.पि व्ही नरसिंहराव विरोधियों के चहिते हो गए है।  राष्ट्रिय स्तर के भाजप को भी नरसिंहराव जी में अच्छाइया दिखने लगी, स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने "मन की बात" कार्यक्रम में स्व.पि व्ही नरसिंहराव को याद करते हुवे देश के आर्थिक विकास में दिए उनके योगदान के लिए सहराना की। स्व.पि व्ही नरसिंहराव तो तेलंगाना के सुपुत्र थे।  तेलंगाना में इस विद्वान स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी को बहुत सन्मान से देखा जाता है।  कोंग्रेसने स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के साथ किये अन्याय की टिस भी तेलंगना की जनता में है।  इसी का फायदा उठाते हुवे तेलंगना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के दिवंगत सुपुत्र पि व्ही नरसिंहराव के जन्मशताब्दी अवसर साल भर उनकी याद में अनेक कार्यक्रम का आयोजन किया है।  साथ ही तेलंगाना की वृत्तपत्र में स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के याद में अच्छे खासे विज्ञापन भी दिए।  दरअसल यह राज्य में अपनी राजनीती चमकाने की चंद्रशेखर राव की कवायद है।  खैर यही सब से कोंग्रेसी जाग गए।  दरसल कांग्रेस पर अर्से से यह आरोप होता रहा है की गाँधी  परिवार को छोड़ कांग्रेस आपने किसी नेता के योगदान का कभी योग्य सन्मान नहीं करती और यह सच भी है।  इसी के चलते भाजप ने कांग्रेस के नेता और भारत के पहिले गृहमंत्री स्व. सरदार वल्लभ भाई पटेल हतिया लिए है।  यही हाल भारत के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्रीजी का भी है।  कांग्रेस ने गाँधी परिवार के आगे भारत के इन महान सुपुत्रों को ज्यादा सन्मान नहीं किया।  
लेकिन अभी कांग्रेस जहा देश में अपनी खोई राजनैतिक जमीन फिर से खोजने में लगी है, तब कांग्रेस इसी सन्मान के मुद्दे पर एक राज्य अपने हात से जाने का खामियाजा नहीं उठा सकती।  यही कारण है की सोनिया गाँधी से लेकर तमाम कांग्रेस के नेताओ को अचानक स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी की तमाम अच्छाइया और देश के लिए उनका योगदान याद आने लगा है।  
याद रखने वाली बात यह है की स्व. नरसिंहरावजी के २००४ में हुवे देहांत के बाद से आज तक कांग्रेस के तमाम नेताओ ने भारत की आर्थिक उन्नति का श्रेय का सेहरा हमेशा तत्कालीन अर्थमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंगजी के ही सर रखा।  लकिन मनमोहनसिंगजी के हर मुश्किल निर्णय के पीछे चट्टान की तरह खड़े तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहरावजी को कभी सन्मानित नहीं किया। लेकिन क्या सिर्फ स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी को श्रद्धांजलि देने से कांग्रेसने किया उनका किया अपमान भुला दिया जाना चाहिए ? क्या कांग्रेस के यही बड़े नेता तब स्व.पि व्ही नरसिंहरावजी के किये अपमान को अपनी भूल मानकर तेलंगाना की जनता से माफ़ी मांगेगे ? यह अब आप ही सोचिये !    
   

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